Tuesday, 5 March 2013

OUR DEMANDS

Posted by Stop Acid Attacks On Tuesday, March 05, 2013 No comments
हमारी मांगें 

1.   हमारे देश में एसिड से होने वाली हिंसा के लिए कोई विशेष कानून नहीं बनाये गए हैं. एसिड अटैक केखिलाफ अभियान चला रहे संगठनों का कहना है कि ऐसी घटनाओं की पीड़ित अधिकतर महिलायें होती है.अगर एसिड अटैक को महिला हिंसा से जोड़ा जाए और इसे शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा के रूप देखा जाय तो इसे रोकने के लिए कानून बनाया जा सकता है.

2.   एसिड अटैक की अधिकतर घटनाओं में पीड़ित की मौत नहीं होती लेकिन एसिड की वजह से उसका पूरा चेहरा और जिंदगी खराब हो जाती है. इसललिए एसिड को लेकर एक अलग व विशेष कानून बनाकर एसिड अटैक को जघन्य अपराध की श्रेणी में रखा जाय. जिसमे अपराधी के लिए  आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान हो.

3.   एसिड अटैक एक क्रूर व अमानवीय अपराध है, लेकिन अभी के बने कानूनों के तहत पीड़ितों को तुरंत और सही न्याय नहीं मिल पाता. ऐसे मामलों की सुनवाई में लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया के बाद थोड़ी ही सजा अपराधी को मिल पाती है. इसलिए एसिड अटैक के लिए विशेष कानून के साथ ही फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था की जानी चाहिए. जिसमे तीन महीने के अंदर केस का फैसला हो.

4.   सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि एसिड अटैक के पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हो पाता. इसलिए सरकार को चाहिए कि वो एक ऐसी एजेंसी बनाये जो ऐसे अपराधों कि सुनवाई कि अगुवाई करते हुए अपनी पूरी नजर रखे और पीड़ित को न्याय दिलवाने मदद करे.

5.   एसिड अटैक को रोकने के लिए प्रोटेक्शन ऑफिसर्स कि नियुक्ति करे.

6.   एसिड अटैक पीड़ित को पूरी कानूनी सहायता दी जाय. ताकि उन्हें न्याय के लिए अधिक संघर्ष न करना पड़े.

7.   सरकार को एसिड अटैक पीड़ितों के मुआवजे और उनकी सरकारी नौकरी की व्यवस्था करे. ताकि वह समाज कि मुख्यधारा में लौट सके.

8.   महिलाओं पर होने वाले  एसिड अटैक के अधिकांश मामलों में देखा गया है कि इलाज़ का खर्च महंगा होने कि वजह से एसिड अटैक के पीड़ितों का सही से इलाज़ नहीं हो पाता. सरकार एसिड अटैक पीड़ित के इलाज़ की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए इनका इलाज़ करवाए.

9.   सरकार एसिड की बिक्री, नियंत्रण व इनके ट्रांसपोर्ट को लेकर तुरंत कानून बनाये व इसके लिए एक ढांचा खड़ा करें ताकि एसिड के दुर्पयोग की सम्भावना न हो.

10. तेज़ाब गिरने के बाद महिलाओं की जिंदगी मौत से बदतर हो जाती है. उन्हें शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक कष्ट के दौर से भी गुजरना पड़ता है. सामजिक दृष्टि से भी वह मुख्यधारा से कट जाती है. सरकार इन सब के लिए प्रशासनिक स्तर पर ऐसी व्यवस्था करे जिससे ये अपनी आगे की जिंदगी बेहतरी और समाज की मुख्यधारा में शामिल हो कर गुजार सके.

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