Monday, 22 April 2013

It's Not Just a Burn: Shalu Awasthi

Posted by Stop Acid Attacks On Monday, April 22, 2013 No comments
"एसिड अटैक सिर्फ शरीर का जलना ही नही है, ऐसे हाद्से अक्सर मन से लेकर आत्मा तक को छलनी कर जाते हैं। लोग अपनी पहचान खो बैठते हैं। वह चेहरा जो इन्सान की पहचान हुआ करता था, अपनी पहचान की तलाश करने लगता है। यह बस शरीर पर हमला नही होता, बल्कि उन सपनो, और उन अरमानो पर भी हमला होता है जो इन्सान ने कभी पिरोये थे।"

देश में महिलाओं के साथ अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। कभी यह अपराध यौन शोषण (बलात्कार) के रूप में सामने आ रहा है तो कभी एसिड अटैक के रूप में। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में महिलाओं की दशा सोचनीय है। क्या इसकी वजह हमारा निठल्ला और कमजोर कानून है? ऐसा कानून जो लोगों के भीतर डर व दहशत बैठाने में असफल है?

ऐसी स्थिति देखकर हम नारी सशक्तिकरण की बात कैसे कर सकते हैं? इन दिनों एसिड अटैक की खबरें आए दिन रिपोर्ट हो रही हैं। लेकन एक सच यह भी है कि एसिड अटैक के बहुत कम ही मामले ऐसे हैं जो लोगों की नजर में आ पाते हैं। सोचने वाली बात तो यह है कि एसिड अटैक का शिकार सिर्फ आम लोग ही नही होते, कई ऐसे कई हाई प्रोफाइल लोग भी हैं जो ऐसे हादसों का शिकार हो चुके हैं। 

एसिड अटैक सिर्फ शरीर का जलना ही नही है, ऐसे हाद्से अक्सर मन से लेकर आत्मा तक को छलनी कर जाते हैं। लोग अपनी पहचान खो बैठते हैं। वह चेहरा जो इन्सान की पहचान हुआ करता था, अपनी पहचान की तलाश करने लगता है। यह बस शरीर पर हमला नही होता, बल्कि उन सपनो, और उन अरमानो पर भी हमला होता है जो इन्सान ने कभी पिरोये थे। पीडिता की सामाजिक ज़िन्दगी खत्म सी हो जाती है। लोगों से मिलना जुलना, साथ उठना बैठना सब बंद हो जाता है। ऐसे में इंसानों के सवालों का जवाब देना बहुत मुश्किल हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान बस पत्थर की मूरत, एक जिन्दा लाश बन के रह जाता है। 

एसिड अटैक मामलो में इन दिनों तेजी से इजाफा हो रहा है। इसका कारण बाजार में आसानी से मिल रहा तेज़ाब है। सरकार को जल्द से जल्द बाजार में तेज़ाब जैसे उत्पादों की बिक्री रोकनी चाहिए। ऐसे कई और चेहरे अपने पहचान की तलाश करे, उससे पहले सरकार को, कानून को ठोस कदम उठाने चाहिये।  

गौर करने वाली बात तो यह है कि इतने भयावह नतीजों के बाद भी सरकार इसकी रोकथाम के लिए कोई सख्त कदम नही उठा रही। अमूमन देखा गया है कि तेज़ाब से हमले के बाद इन्सान की मौत तो नही होती, पर जिंदगी मौत से बदतर हो जाती है। तो ऐसे में दोषी की सजा कम से कम आजीवन कारावास तो होनी ही चाहिए।

(शालू अवस्थी, युवा पत्रकार है और लखनऊ से हमारे कैंपेन को रिप्रेजेंट कर रही हैं। महिला अधिकार विषय में विशेष रूचि रखने वाली शालू, इन दिनों कैंपेन के साथ जुड़कर इस दिशा में सार्थक बदलाव लाने की कोशिश में हैं। उनसे shaluawasthi.101@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।) 



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