Saturday, 11 May 2013

A single rose can be our garden

Posted by Stop Acid Attacks On Saturday, May 11, 2013 2 comments

जल्द ही मिलेगी तेजाब पीड़ितों को ‘छांव’

तेजाब हमलों से लड़ते हुए हमारे अभियान को अब लगभग दो महीने पूरे हो गए हैं। इस बीच जहां हमें कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा वहीं दूसरी ओर कई मजबूत साथी भी मिले जिन्होने न सिर्फ हौसले को जिंदा रखा बल्कि ना जाने कब वो अभियान के कर्णधार हो गए पता ही नहीं चला। 12 मई को हम एक पुनर्वास केंद्र ‘छांव’ की शुरूआत करना चाहते थे पर आखिरी समय पर हमें घर नहीं मिल पाया। हम इस तरह के अनुभव भी मिले कि मुद्दे की भयावहता से घबराकर लोग किराए पर घर देने से मना कर रहे हैं। आस-पड़ोस के लोगों को भी लगता है कि उन्हे उनकी सोसाइटी में ऐसे वीभत्स चेहरे नहीं चाहिये। दुखद है पर सच है कि अब के समाज में भावनाओं की निहायत कमी हो गई है। एक व्यक्ति किसी लड़की पर तेजाब फेकता है और समाज उस अपराधी को स्वीकार भी कर लेता है। जिस व्यक्ति पर तेजाब फेका जाता है वह समाज द्वारा तिरस्क़त कर दिया जाता है और जो तेजाब फेकता है एक आसान जिंदगी जीता है, शादी कर लेता है, परिवार बनाता है और कानून की कमजोरियों का फायदा उठा कर बार बार बचता रहता है। ऐसे में सजा का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। मैंने देखा है कि कैसे अपराध समाज का हिस्सा बन जाते हैं और अपराधी समाज। हम इसी तरह की परेशानियों से भी जूझ रहे हैं जब हमें बार बार बता दिया जाता है कि मकान का मालिक हमें अपना मकान किराए पर देना ही नहीं चाहता। कई बार तो बड़े मासूम से बहाने सुनने को मिलते हैं हमें, जैसे कि मकान मालिक के घर में शादी है इसलिये अभी मकान किराए पर देने का विचार बदल दिया है, या फिर कि जिस जगह का किराया 25 हजार भी नहीं है हमसे 40 हजार की मांग रखी जाती है ताकि वह मकान हम न ले सकें। एक बूढ़ी आंटी तो सब कुछ तय करके मुकर गईं जब उन्हे पता चला कि तेजाब से जली लड़कियां और उनका परिवार वहां रहेगा। उनका कहना था कि उन्हे इस तरह का डिस्टर्बेंस पसंद नहीं है, जबकि इसके पहले उसी जगह पर वहां एक पब्लिक लाइब्रेरी चलती थी। हमें इस बीच कई तरह के बहाने सुनने पड़े। पहले गुस्सा आई पर अब हसी आती है केवल। हमें बार बार समाज के इसी वर्ग से रूबरू होना पड़ता है जो भावनाशून्य है और जो खुद में उलझा हुआ है। यह समाज अपराध तो नहीं करता पर अपराध का सबसे बड़ा कारण यही है। हमें इस समाज को नजरंदाज कर इसी गलती को दोहराना नहीं है। हमें इनके साथ लगातार जूझते रहना होगा।

जल्द ही (अधिकतम एक सप्ताह) हम स्टाप ऐसिड अटैक्स अभियान के तहत एक पुनर्वास केंद्र की शुरूआत करेंगे और एक सेमिनार कर इस मुद्दे के तमाम नए पहलू आपके सामने लाएंगे। ऐसिड फाइटर तुबा बिहार से अपने इलाज के लिये दिल्ली आई है। उसे यहां रूकने की जगह चाहिये। अर्चना के कान की सर्जरी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हो रही है। ऐसे ही तमाम फाइटर्स को दिल्ली में रूकने और इलाज कराने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हम यह समझते हैं इसलिये एक शुरूआत तो जल्द से जल्द करनी ही है। अगर आप इसमें हमारी कोई मदद कर सकते हैं तो हमसे stopacidattacks@gmail.com पर संपर्क करें या वेबसाइट पर दिये नम्बर पर फोन करें।
“What difference does it make to the dead, the orphans and the homeless, whether the mad destruction is wrought under the name of totalitarianism or in the holy name of liberty or democracy?”- Mahatma Gandhi


(Alok Dixit is a journalist turned social activist, fighting for the freedom of internet in India. He is the founder member of 'Save Your Voice’, a movement against internet censorship in India and 'Stop Acid Attacks' Campaign.)


2 comments:

  1. Unbelieveble work from Ur side.Good,Very Good.I Must Join U@Arun singh chandel,National President:Rural journalist association of india./Bundelkhand vikas dal.
    www.rjai.net www.bundelkhandvikasdal.org

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    1. Arun ji, please send us an email on stopacidattacksATgmail.com. We'll get back to you shortly.

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